पत्रकारों की नर्सरी में भंगार साइकिलों के हिसाब से लेकर मुर्दों की जानकारी लाने का युग:(डॉ प्रदीपसिंह राव)।
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पत्रकारों की नर्सरी में भंगार साइकिलों के हिसाब से लेकर मुर्दों की जानकारी लाने का युग:(डॉ प्रदीपसिंह राव)।
Update24x.in:-
रतलाम। नई दुनिया का वर्चस्व धीरे धीरे पूरे प्रदेश और देश में फैल गया था।जो भी इससे जुड़ा उसे ख्याति मिली।प्रदेश की राजनीति में हलचल हो जाती थी जब कुछ भी इधर उधर का छप जाता। सरोज कुमार का स्वांतः सुखय,या चंद्रसिंह अनुज की कहानियां हों,जयसिंह, डॉ प्रभाकर मचावे, प्रो रणवीर सक्सेना,दत्तात्रेय सर मंडल ,विष्णु नागर,सुरेंद्र शर्मा,ताम्रकार, जैसे कई विख्यात लोग नईदुनिया से जुड़े रहे।

अभय छजलानी को पत्रकारिता के अप्रतिम योगदान के लिए पद्मश्री मिला !!!नईदुनिया का यश राजबाड़े की कीर्ति के समतुल्य बन गया था !! कालांतर में कई अखबार (आज लगभग 30)इंदौर से निकलने लगे,या लोकप्रिय होने लगे। इंदौर समाचार,स्वदेश,नवभारत,प्रभात किरण,चौथा संसार,अग्निबाण, राज एक्सप्रेस,दबंग दुनिया,पत्रिका,कितने ही अखबार इंदौर की पहचान बनते गए,,,फिर भोपाल ग्वालियर में धूम मचाते हुए भास्कर का इंदौर में उदय हुआ ,
भास्कर का इंदौर से उदय होना:-

भास्कर की उस शुरुआती टीम में मै भी था जब भास्कर की कॉम्प्लीमेंट्री, डमी कॉपियां शुरू हुई थी,रमेश जी,मनमोहन जी का प्रबंधन था,यतींद्र भटनागर संपादक थे, गोकुल शर्मा जी सिटी डेस्क इंचार्ज थे,डाक पर मौला जी,फ्रंट पर सुरेश राठौर जी,सिटी में,मोहन राठौर ,कीर्ति राणा मै प्रदीप सिंह राव, अर्जुन राठौर सा,,, (जो याद है,)प्रदीप पंडित इंग्लिश से हिंदी अनुवाद भी करते, शरद जोशी (प्रसिद्ध व्यंग्यकार) के भाई रोमेश जोशी का भी साथ था।खेल डेस्क,अशोक कुमट , नगीनसुबीर,धर्मेश यशलहा,आदि थे,उन दिनों शाहिद मिर्जा जुड़ गए थे।उस समय साइकल पर पूरे इंदौर की रिपोर्टिंग करते थे, धूप ,गर्मी,ठंड,बरसात कुछ भी हो।बहुत कम वेतन था, परिश्रम की सीमा न थी,, !!!
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में भास्कर की अस्तित्व की छटपटाहट:-

उन दिनों श्री राम ताम्रकार पॉकेट में बहुत सारे ढेर रंग बिरंगे पेन लेकर आते और शानदार ले आउट देते,सुंदर लेखनी थी उनकी,,बहुत प्यार करते थे,अशोक सर,गोकुल जी और भटनागर जी हमे सम्हालते,समझते और रमेशजी की डाट से भी बचाते!!,लेकिन 1983-84 तक के शुरुआती भास्कर की प्रतियां (संदर्भ,भास्कर)देख लीजिए,,कितना परिश्रम किया था,,नईदुनिया से स्पर्धा के लिए,,,,अनंत चौदस,छात्रसंघ चुनाव,पार्षदों की बात,संस्था दर्शन,,,साक्षात्कार,,,,और उन दिनों एक रिपोर्टिंग की थी मैने खान नदी पर,,,नदियां जो बन गई नालियां,,,,आज भी संजो रखी है,,विसर्जन आश्रम पर लिखा था,,,विनोबा की खाक से बना आश्रम,,,यादगार थे वो दिन,,,, कीर्ति राणा और मेरी जोड़ी थी।,,मुझे एक किस्सा और याद है,कॉलेज से निकल कर तब हम पत्रकारिता में किस्मत आजमाने खूब घूमते,प्रभात किरण के प्रकाश पुरोहित के पास गए,स्वदेश माणक चंद वाजपेई के पास गए,कृषक जगत भोपाल में काम किया,लेकिन नईदुनिया में लिखते रहने के कारण खूब दरवाजे पर दस्तक दी,जगह न मिली,राजेन्द्र माथुर (9अप्रैल,पुण्य तिथि) के पास संदर्भ विभाग में गया था तब,गुलाबजी के पास समीक्षा के लिए पुस्तकें लेनी थी,मैने माथुर दा से कहा कि मै सिटी रिपोर्टर बनाना चाहता हूं,वे मुझे अच्छा लेखक कहते थे,बोले! रेलवे स्टेशन जाओ, और वहां पड़ी लावारिस साईकलो का इतिहास लाओ!! मै फंस गया,,,,,वो रिपोर्टिंग बना तो ली लेकिन कभी माथुर सा को दिखाने की हिम्मत न हुई!!!,
मुर्दों की हर दिन जानकारी , लाइए:-

एक बार भास्कर में भी ऐसा रोचक किस्सा हुआ।रमेशजी ने मुझे बोला रोज चारों मुक्तिधाम जाओ और रिपोर्ट बनाओ कि कितने लोग मरे,नाम पते लाओ।!! मैं हैरान हो गया,मरता क्या न करता, साइकिल से पूरा शहर नापता,मुक्तिधामों की सात दिनों तक परिक्रमा कर- कर के थक गया।संपादक से बोला ये क्या है?वो बोले आप रमेशजी से ही बात करिए।मैने साहस के साथ रमेशजी को बोला कि भाईसा,रोज मुर्दों की जानकारी लाता हूं, छपती भी न??वो मुस्कुराए,बोले आप भावुक बहुत हो, इसलिए आपकी ट्रेनिंग थी

।पत्रकारिता में भावुकता नहीं चलती।कल से सिटी डेस्क के काम संभालिए।,!!!ऐसा था भास्कर का शिशुकुंज,जीवंत ट्रेनिंग।इसलिए ऊंचाइयों की हदें पार की भास्कर ने।