(इंदौर प्रेस क्लब का लंबा संघर्ष और ऐतिहासिक सामाजिक जागरूकता)   डॉ प्रदीपसिंह राव   की कलम से

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(इंदौर प्रेस क्लब का लंबा संघर्ष और ऐतिहासिक सामाजिक जागरूकता)   डॉ प्रदीपसिंह राव   की कलम से

(इंदौर प्रेस क्लब का लंबा संघर्ष और ऐतिहासिक सामाजिक जागरूकता)   डॉ प्रदीपसिंह राव   की कलम से

Update23x.in:-

रतलाम।  हाल ही में भोपाल में "उदंत मार्तंड"तीन दिवसीय अखिल भारतीय पत्रकारिता उत्सव सम्पन्न हुआ।भारत के पहले हिंदी समाचार पत्र के प्रकाशन के इस 30 मई 2026को 200 वर्ष पूरे हो गए।उगता सूरज,,"यानी उदंत मार्तंड"साप्ताहिक समाचार पत्र का पहला अंक मंगलवार 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था।कानपुर के पंडित जुगलकिशोर शुक्ला ने इसे शुरू किया था। वो ही संस्थापक संपादक थे।यानी भारत में हिंदी पत्रकारिता का युगारंभ दो सौ वर्ष पूर्व हो गया था। इंदौर में पत्रकारिता होलकर युग से ही शुरू हो चुकी थी जिसे आपने पिछले अंकों में पढ़ा था।लेकिन व्यवस्थित और निरंतरता के साथ अखबारों को आजादी के बाद ही  उचित स्थान मिला।दिग्गज पत्रकारों ने नींव रख दी थी।

जिनमें राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, वेद प्रताप वैदिक,मानक चंद वाजपेई,शरद जोशी, डॉ वल्लभ मचावे,अजीत प्रसाद जैन,दिनेश मिश्र,जवाहर चौधरी और प्रकाश हिंदुस्तानी जैसे अनेक  लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकारों ने अपनी वैचारिक तपस्या से इंदौर को समूचे देश में रोशन किया।  

   हम तीस  दिग्गजों के  संकल्पों से  बना संगठन :- 

 

   1957/58में इंदौर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा

 था।आजादी के 10/11वर्ष बीत गए थे।उपरोक्त शीर्ष पत्रकारों की पहल पर 1957में 30 चिंतकों ने पत्रकारिता के संगठन की विधिवत योजना बनाई और ,9अप्रैल 1961में तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवंत  राव मंडलोई, (खंडवा वाले) ने इंदौर प्रेस क्लब की शुरुआती सौगात दी थी।उल्लेखनीय है कि हिंदी साहित्य समिति के सभागृह में तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ शंकर दयाल शर्मा,और वित्त मंत्री इंदौर के मिश्रीलाल गंगवाल तथा इंदौर के तत्कालीन नगर निगम महापौर  आर एन जुत्थी के आतिथ्य में इंदौर प्रेस क्लब का शुभारंभ हुआ।तब नगर निगम के उस समय के जनसंपर्क अधिकारी महेंद्र तिवारी प्रेस क्लब के तदर्थ समिति के संयोजक थे।

 जूना  राजबाड़ा  का वो  प्रेस क्लब का  नन्हा सा  कमरा:-

  तब जूना राजबाड़ा स्थित  सूचना विभाग में प्रेस क्लब का कार्यालय एक छोटे कमरे में चलता था  सादगी का समय था हर दिन शाम 6से 10 बजे तक कार्यालय खुलता था।1962को तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पहले प्रेस क्लब के अतिथि के रूप में आमंत्रित किए गए तो मेडिकल कॉलेज के सभागार में आयोजन रखा गया। भारी भीड़ थी और सभागृह खचाखच भर  गया था। पहले किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल का भवन था।उसी की लाइब्रेरी को सभागार बनाया था। 1जुलाई1962को प्रेस क्लब के प्रथम चुनाव हुए,जिसमें  आम सहमति से नईदुनिया के राहुल बारपुते  संस्थापक अध्यक्ष बने,तब वो संपादक थे।तब पहले उपाध्यक्ष अजीत प्रसाद जैन,सचिव ओ पी तनेजा और संयुक्त सचिव महेंद्र त्रिवेदी,और कोषाध्यक्ष सुमन वर्मा बने।  प्रेस क्लब भटकता रहा।  

      एक रुपए  साल की लीज पर मिला  प्रेस क्लब को भवन :-

 

1जनवरी1965को नगरनिगम ने स्टेडियम में एक कमरा दिया।प्रेस क्लब 11रुपए किराया भरता था 1968 में एमडीएच कम्पाउंड में 216रुपए किराए पर एक भवन मिला।जो कालांतर में मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने एक रु की वार्षिक लीज पर प्रेस क्लब को आवंटित कर दिया,यह भवन हमेशा के लिए प्रेस क्लब का स्थाई  कार्यालय बन गया।।श्यामा चरण जी का ससुराल इंदौर के बियाबानी में था,तो यह इंदौर के दामाद की सौगात हो गई।11वर्षों तक बारपुते जी अध्यक्ष रहे। 1974में राजेंद्र माथुर प्रेस क्लब अध्यक्ष बने।तब तक जन सहयोग और अनुदान से प्रेस क्लब की बुनियाद ठोस की जाने लगी।सदस्यता 2रुपए थी।

तूफान और युद्ध में डिब्बा लेकर गए जनता के बीच:- 

1977 में आंध्र तूफान पीड़ितों के लिए प्रेस  क्लब ने जुलूस निकाला डिब्बा ले कर धन,और कपड़े,अनाज आदि संग्रह किया।3682रु एकत्र कर भिजवाये।जो  उस समय की बड़ी राशि थी।चीन आक्रमण के समय 1962में स्थापना के प्रारंभिक समय में ही 1000 रूपये और 100 ग्राम सोना एकत्र कर भिजवाया था जो उस समय 1197.50 रुपए का था।,,,अर्पण जैन,और वेब दुनिया आदि सूत्रों से और रोचक जानकारियां मिली हैं जो आगे जारी रहेगी।   

   साइकल से  ऐतिहासिक जीत कामरेड होमिदजी की :-

यह इंदौर की राजनीति की बड़ी दिलचस्प घटना है।उस समय  इंदौर में मिलों की बहुतायत थी और लगभग 15000 मजदूर काम करते थे।आम लोग और श्रमिक साइकिल का इस्तेमाल करते थे।लेकिन तब नगर निगम ने साइकिल टैक्स लगा रखा था  ।इससे भरी असंतोष था।तब कामरेड होमिदाजी मजदूर नेता थे।उन्होंने इसके विरुद्ध श्रमिकों के साथ मोर्चा खोला और विरोध किया।तब भी टैक्स न हटाया गया।जब नगर निगम चुनाव हुए तो कामरेड दाजी चुनाव लड़े और ऐतिहासिक जीत दर्ज की।तत्काल साइकिल टैक्स हटवा दिया।इसी जनसमर्थन से वो 1962का लोक सभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत गए। लगभग 64 वर्ष पूर्व वो इंदौर के पहले नेता थे जिन्होंने गैर कांग्रेसी हो कर जीत दिलवाई।जबकि पंडित नेहरू की चुनावी अपील भी कांग्रेस के रामसिंह  को जीता न सकी।